अल्फ़ा, बीटा या ओमेगा टेस्ट
ग्रुप की पंद्रह स्थितियाँ, जो सीधे पूछे बिना बता देंगी कि आप असल में कहाँ खड़े हैं।
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इस टेस्ट के बारे में
अल्फ़ा, बीटा, ओमेगा: तीन शब्द जो इंटरनेट पर सामाजिक दर्जे का सार्वभौमिक पैमाना बन गए। जवाब देने से पहले एक बात जानने लायक़ है। यह पदानुक्रम पिंजरे में रखे भेड़ियों पर किए गए एक अध्ययन से निकला था, जिसे 1970 के दशक में जीवविज्ञानी डेविड मेक ने मशहूर किया। उसी डेविड मेक ने आगे के दशक सार्वजनिक रूप से यह कहते बिताए कि उनकी किताब का हवाला देना बंद किया जाए: जंगली भेड़ियों को देखकर उन्होंने पाया कि झुंड दबदबे का पिरामिड नहीं, एक परिवार होता है, जहाँ 'अल्फ़ा' दरअसल माँ-बाप हैं। उन्होंने खुद माँग की थी कि उनकी किताब का नया संस्करण छापा न जाए।
यानी: भेड़ियों के मामले में यह उपमा ग़लत है। फिर भी इंसानों में यह एक सच्ची चीज़ बताने के काम आती है — वह जगह जो हर कोई किसी ग्रुप में अपने आप ले लेता है। मीटिंग कौन शुरू करता है, टूटी बातें कौन जोड़ता है, और दरवाज़े की तरफ़ कौन देखता रहता है।
यह टेस्ट बस वही जगह नापता है, और कुछ नहीं। 'मुझमें रुतबा है' जैसे कथनों के बजाय पंद्रह ठोस स्थितियाँ, क्योंकि अपने नंबर इंसान हमेशा ग़लत देता है। और एक याद दिलाना: काम पर आप जो भूमिका निभाते हैं वह बचपन के दोस्तों के बीच निभाई भूमिका लगभग कभी नहीं होती।
यह टेस्ट केवल मनोरंजन के लिए है। यह न कोई निदान है और न ही किसी पेशेवर की सलाह।